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Thursday, February 17, 2022

हनुमानजी से सीखें मैनेजमेंट के 10 गुण - Hanuman motivational quotes in hindi

 

अंजनीपुत्र हनुमानजी एक कुशल प्रबंधन थे। मन, कर्म और वाणी पर संतुलन यह जी से सीखा जा सकता है। ज्ञान, बुद्धि, विद्या और बल के साथ ही उनमें विनम्रता भी अपार थी। सही समय पर सही कार्य करना और कार्य को अंजाम तक पहुंचाने का उनमें चमत्कारिक गुण था। आओ जानते हैं कि किस तरह उनमें कार्य का संपादन करने की अद्भुत क्षमता थी जो आज के मैनेजर्स और कर्मठ लोगों को सीखना चाहिए।

1. सीखने की लगन : हनुमानजी ने बचपन से लेकर अंत तक सभी से कुछ ना कुछ सीखा था। कहते हैं कि उन्होंने अपनी माता अंजनी और पिता केसरी के साथ ही धर्मपिता पवनपुत्र से भी भी शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने शबरी के गुरु ऋषि मतंग से भी शिक्षा ली थी और भगवान सूर्य से उन्होंने सभी तरह की विद्या ग्रहण की थी।


2. कार्य में कुशलता और निपुणता : हनुमानजी के कार्य करने की शैली अनूठी थी साथ वे कार्य में कुशल और निपुण थे। उन्होंने सुग्रीव की सहाता हेतु उन्हें श्रीराम से मिलाया और राम की सहायता हेतु उन्होंने वह सब कुछ अपनी बुद्धि कौशल से किया जो प्रभु श्रीराम ने आदेश दिया। वे कार्य में कुशल हैं। हनुमानजी ने सेना से लेकर समुद्र को पार करने तक जो कार्य कुशलता व बुद्धि के साथ किया वह उनके विशिष्ट मैनेजमेंट को दर्शाता|

3. राइट प्लानिंग, वैल्यूज और कमिटमेंट : हनुमानजी को जो कार्य सौंपा जाता था पहले वह उसकी प्लानिंग करते थे और फिर इंप्लीमेंटेशन करते थे। जैसे श्रीराम ने तो लंका भेजते वक्त हनुमानजी से यही कहा था कि यह अंगुठी श्री सीता को दिखाकर कहना की राम जल्द ही आएंगे परंतु हनुमानजी ही जानते थे कि समुद्र को पार करते वक्त बाधाएं आएगी और लंका में प्रवेश करते वक्त भी वह जानते थे कि क्या होने की संभावना है। उन्होंने कड़े रूप में रावण को राम का संदेश भी दिया, विभीषण को राम की ओर खींच लाएं, अक्षयकुमार का वध भी कर दिया और माता सीता को अंगुठी देकर लंका भी जला डाली और सकुशल लौट भी आए। यह सभी उनकी कार्य योजना का ही हिस्सा था। बुद्धि के साथ सही प्लानिंग करने की उनमें गजब की क्षमता है। हनुमानजी का प्रबंधन क्षेत्र बड़े ही विस्तृत, विलक्षण और योजना के प्रमुख योजनाकार के रूप में जाना जाता है। हनुमानजी के आदर्श बताते हैं कि डेडिकेशन, कमिटमेंट, और डिवोशन से हर बाधा पार की जा सकती है। लाइफ में इन वैल्यूज का महत्व कभी कम नहीं होता।

लंका पहुंचने से पहले उन्होंने पूरी रणनीति बनाई। असुरों की इतनी भीड़ में भी विभीषण जैसा सज्जन ढूंढा। उससे मित्रता की और सीता मां का पता लगाया। भय फैलाने के लिए लंका को जलाया। विभीषण को प्रभु राम से मिलाया। इस प्रकार पूरे मैनेजमेंट के साथ काम को अंजाम दिया।
4. दूरदर्शिता : यह हनुमानजी की दूरदर्शिता ही थी कि उन्होंने सहज और सरल वार्तालाप के अपने गुण से कपिराज सुग्रीव से श्रीराम की मैत्री कराई और बाद में उन्होंने विभीषण की श्रीराम से मैत्री कराई। सुग्रीम ने श्रीराम की मदद से बालि को मारा तो श्रीराम ने विभीषण की मदद से रावण को मारा। हनुमानजी की कुशलता एवं चतुरता के चलते ही यह संभव हुआ था।

5. नीति कुशल : राजकोष व पराई स्त्री को प्राप्त करने के बाद सुग्रीव ने श्रीराम का साथ छोड़ दिया था परंतु हनुमानजी ने उसे चारों विधियों साम, दाम, दण्ड, भेद नीति का प्रयोग कर श्रीराम के कार्यों के प्रति उनकी जिम्मेदारी और मैत्रीधर्म की याद दिलाई। इसके अलावा ऐसे कई मौके थे जबकि हनुमानजी को नीति का प्रयोग करना पड़ा था। हनुमानजी मैनेजमेंट की यह सीख देते हैं कि अगर लक्ष्य महान हो और उसे पाना सभी के हित में हो तो हर प्रकार की नीति अपनाई जा सकती है।

6. साहस : हनुमानजी में अदम्य साहस है। वे किसी भी प्रकार की विपरीत परिस्थितियों से विचलित हुए बगैर दृढ़ इच्छाशक्ति से आगे बढ़ते गए। रावण को सीख देने में उनकी निर्भीकता, दृढ़ता, स्पष्टता और निश्चिंतता अप्रतिम है। उनमें न कहीं दिखावा है, न छल कपट। व्यवहार में पारदर्शिता है, कुटिलता नहीं। उनमें अपनी बात को कहने का नैतिक साहस हैं। उनके साहस और बुद्धि कौशल व नीति की प्रशंसा तो रावण भी करता था।

7. लीडरशिप : हनुमानजी श्रीराम की आज्ञा जरूर मानते थे परंतु वह वानरयूथ थे। अर्थात वह संपूर्ण वानर सेना के लीडर थे। सबको साथ लेकर चलने की क्षमता श्रीराम पहचान गए थे। कठिनाइयों में जो निर्भयता और साहसपूर्वक साथियों का सहायक और मार्गदर्शक बन सके लक्ष्य प्राप्ति हेतु जिसमें उत्साह और जोश, धैर्य और लगन हो, कठिनाइयों पर विजय पाने, परिस्थितियों को अपने अनुकूल कर लेने का संकल्प और क्षमता हो, सबकी सलाह सुनने का गुण हो वही तो लीडर बन सकता है। उन्होंने जामवंत से मार्गदर्शन लिया और उत्साह पूर्वक रामकाज किया। सबको सम्मानित करना, सक्रिय और ऊर्जा संपन्न होकर कार्य में निरंतरता बनाए रखने की क्षमता भी कार्यसिद्धि का सिद्ध मंत्र है।
8. हर परिस्थिति में मस्त रहना : हनुमानजी के चेहरे पर कभी चिंता, निराशा या शोक नहीं देख सकते। वह हर हाल में मस्त रहते हैं। हनुमानजी कार्य करने के दौरान कभी गंभीर नहीं रहे उन्होंने हर कार्य को एक उत्सव वा खेल की तरह लिया। उनमें आज की सबसे अनिवार्य मैनेजमेंट क्वॉलिटी है कि वे अपना विनोदी स्वभाव हर सिचुएशन में बनाए रखते हैं। आपको याद होगा लंका गए तब उन्होंने मद मस्त होकर खूब फल खाए और बगीचे को उजाड़कर अपना मनोरंजन भी किया और साथ ही रावण को संदेश भी दे दिया। इसी तरह उन्होंने द्वारिका के बगीचे में भी खूब फल खाकर मनोरंजन किया था और अंत में बलराम का घमंड भी चूर कर दिया था। उन्होंने मनोरंजन में ही कई घमंडियों का घमंड तोड़ दिया था।

9. शुत्र पर निगाहें : हनुमानजी किसी भी परिस्थिति में कैसे भी हो। भजन कर रहे हो या कहीं आसमान में उड़ रहे हैं या फल फूल खा रहे हों, परंतु उनकी नजर अपने शत्रुओं पर जरूर रहती है। विरोधी के असावधान रहते ही उसके रहस्य को जान लेना शत्रुओं के बीच दोस्त खोज लेने की दक्षता विभीषण प्रसंग में दिखाई देती है। उनके हर कार्य में थिंक और एक्ट का अद्भुत कॉम्बिनेशन है।
10. विनम्रता : हनुमानजी महा सर्वशक्तिशाली थे। हनुमानजी के लंका को उजाड़ा, कई असुरों का संहार किया, शनिदेव का घमंड चूर चूर किया, पौंड्रक की नगरी को उजाड़ा, भीम का घमंड किया चूर किया, अर्जुन का घमंड चूर किया, बलरामजी का घमंड चूर किया और संपूर्ण जगत को यह जता दिया कि वे क्या हैं परंतु उन्होंने कभी भी खुद विन्रता और भक्ति का साथ नहीं छोड़ा। रावण से भी विनम्र रूप में ही पेश आए तो अर्जुन से भी। सभी के समक्ष विनम्र रहकर ही उन्हें समझाया परंतु जब वे नहीं समझे तो प्रभु की आज्ञा से ही अपना पराक्रम दिखाया। यदि आप टीमवर्क कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं फिर भी एक प्रबंधक का विनम्र होना जरूरी है अन्यथा उसे समझना चाहिए कि उसका घमंड भी कुछ ही समय का होगा।

Tuesday, June 23, 2020

रिजटा रामायण की एक पात्रा

(रा.च.मा ५।६)

 
 
राक्षसी होते हुए भी त्रिजटा को मानव-मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान है । वह सीताजी के स्वभाव और मनोभाव को अच्छी तरह समझती है । वह यह भलीभांति जानती है कि सीताजी को सांत्वना के लिये और उनके दुखों को दूर करने के लिये रामकथा से बढकर दूसरा कोई उपाय नहीं है।















सीता जी का विरह जब असह्य हो चला तब मरणातुर सीताजी आत्मत्याग के लिये जब त्रिजटा से अग्नि की याचना करती हैं , सीताजी त्रिजटा से कहती है के चिता बनाकर सजा दे और उसमे आग लगा दे, तो इस अनुरोंध को वह बुद्धिमान राम भक्ता यह कहकर टाल देती है कि रात्रि के समय अग्नि नहीं मिलेगी और सीताजी के प्रबोधके लिये वह राम यश गुणगान का सहारा लेती है ।




















ज्ञान गुणसागर हनुमान जी ने भी जब अशोकवाटिका में सीटा जी की विपत्ति देखी तो उनके प्रबोधके लिये उन्हें कोई उपाय सूझा ही नहीं । वे सीताजी के रूप और स्वभाव दोनोंही से अपरिचित थे ।
उन्होंने त्रिजटा प्रयुक्त विधिका ही अनुसरण किया । रावण त्रासिता सीताजी को राम सुयश सुनने से ही सांत्वना मिली थी, यह हनुमान् जी ऊपर पल्लवोंमें छिपे बैठे देख रहे थे।













त्रिजटाके चले जानेके बाद सीताजी और भी व्याकुल हो उठी । तब उनकी परिशान्ति के लिये हनुमान जी ने भी श्रीराम गुणगान सुनाये ।
दानवी होनेके कारण त्रिजटा में दानव मनोविज्ञान का ज्ञान तो था ही । दानवोंका अधिक विश्वास दैहिक शक्तिमे है और इसीलिये उन्हें कार्यविरत करनेमें भय अधिक कारगर होता है।
सीताजी को वशीभूत करने के लिये रावणने भय और त्रासका सहारा लिया था और तदनुसार राक्षसियों को ऐसा ही अनुदेश करके यह चला गया था । सीताजीका दुख दूना हो गया, क्योंकि राक्षसियाँ नाना भाँति बह्यंकर रूप बना बनाकर उन्हें डराने धमकाने लगी ।






















व्यवहार-विशारद त्रिजटा के लिये यह असह्य हो गया । वर्जन के लिये उस पण्डिता ने विवेकपूर्ण एक युक्ति निकाली । उसने राक्षस मनोविज्ञान का सहारा लिया और एक भयानक स्वप्न कथा की सृष्टि की ।उसने सब राक्षसियों को बुलवाकर कहा सब सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो।
त्रिजटा ने उन राक्षसियों से कहा की मैंने एक स्वप्न देखा है। स्वप्नमे मैंने देखा कि एक बंदर ने लंका जला दी । राक्षसों की सारी सेना मार डाली गयी । रावण नंगा है और गधे पर सवार है । उसके सिर मुँड़े हुए हैं बीसो भुजाएँ कटी हुई है ।





















इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो लंका बिभीषण ने पायी है। लंका में श्री रामचंद्र जी की दुहाई फिर गयी । तब प्रभुने सीताजीको बुलावा भेजा।
पुकारकर (निश्चय के साथ ) कहती हू कि यह स्वप्न चार ( कुछ ही) दिनों में सत्य होकर रहेगा । उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयी और  जानकी जी के चरणों पर गिर पड़ी।
इस स्वप्न वार्तासे एक ओर जहाँ त्रिज़टा का भविष्य दर्शिनी होना सिद्ध होता है, वहीं दूसरी ओर उसका व्यवहार-निपुणा और विवेकिनी होना भी उद्धाटित होता है।


















भय दिखाकर दूसरे को वशीभूत करनेवाली मण्डलि को उसने भावी भयकी सूचना देकर मनोनुकूल बना लिया । प्रत्यक्ष वर्जन मे तो राजकोप का डर था, अनिष्ट की सम्भावना थी । उसने उन राक्षसियों को साक्षात भक्तिरूपा सीता जी के चरणों में डाल दिया । यही तो भक्तो संतो का स्वभाव है।























लंका काण्डके युद्ध- प्रसंग में त्रिज़टा की चातुरीका एक और विलक्षण उदाहरण मिलता है । राम रावण युद्ध चरम सीमापर है । रावण छोर युद्ध कर रहा है । उसके सिर कट-कट करके भी पुन: जुट जाते हैं । भुजाओ को खोकर
भी वह नवीन भुजावाला बन जाता है और श्रीराम के मारे भी नहीं मरता । अशोक वाटिका में त्रिज़टा के मुँहसे यह प्रसङ्ग सुनकर सीताजी व्याकुल हो जाती हैं । श्री रामचंद्र के बाणों से भी नहीं मरनेवाले रावणके बन्धनसे वह अब मुक्त होनेकी आशा त्याग देनेको हो जाती हैं।


























त्रिजटा को परिस्थितिवश अनुभव होता है । वह सीताजी की मनोदशा को देखकर फिर प्रभु श्रीरामके बलका वर्णन करती है और सीता को श्रीराम की विजय का विश्वास दिलाती है।
त्रिजटाने कहा- *राजकुमारी ! सुनो, देवताओ का। शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा ।परन्तु प्रभु उसके हृदय मे बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमे जानकी जी (आप) बसती हैं ।*
श्री राम जी यही सोचकर रह जाते हैं कि इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हदयमे मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भूवन हैं । अत: रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा । यह वचन सुनकर, सीताजी के मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ यह देखकर त्रिजटाने फिर कहा-



















  • सुन्दरी !*
  • महान सन्देह का त्याग कर दो अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा । सिरोंके बार बर कटि जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदय से तुम्हारा ध्यान छूट जायेगा और उसकी मृत्यु होगी।*



















(रावण हर क्षण जानकी जी को प्राप्त करने के बारे में ,उन्हें अपना बनाने के बारे में ही सोचता रहता अतः ह्रदय से जानकी जी का ही विचार करता रहता । संतो ने सीता माँ को साक्षात् भक्ति ही बताया है। रावण भक्ति को जबरन अपने बल से प्राप्त करना चाहता है, परंतु क्या भक्ति इस तरह प्राप्त होती है?
भक्ति तो संतो के संग से, प्रभु लीला चिंतन एवं जानकी जी की कृपा दृष्टी से ही प्राप्त हो सकती है । जानकी माता ने तो कभी रावण की ओर दृष्टी तक नहीं डालीं । रावण को पता था की प्रभु से वैर करने पर उन्हें हाथो मृत्यु होगी तो मोक्ष प्राप्त हो जायेगा परंतु प्रभु चरणों की भक्ति नहीं प्राप्त होगी। )






















जानकी माता ने पुत्र कहकर हनुमान जी से और माता कहकर त्रिजटा से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया। किशोरी जी की कृपा हो गयी तब राम भक्ति सुलभ है। हनुमान जी को और त्रिजटा को सीता माँ ने अखंड भक्ति का दान दिया है ।सीता जी के प्राणों की रक्षा करने में और उनकी पीड़ा कम करने में हनुमान जी और त्रिजटा का मुख्य सहयोग रहा है।













संतो ने कहा है लगभग २ वर्ष तक सीताजी लंका में रही(कोई ४३५ दिन मानते है) और त्रिजटा अत्यंत भाग्यशाली रही की राक्षसी होने पर भी उन्हें साक्षात् भक्ति श्री सीता जी का प्रत्येक क्षण संग मिला,सेवा मिली और प्रेम मिला।
संत कहते है भगवान् के पास देने के लिए सबसे छोटी वस्तु कोई है तो वो है मोक्ष और भगवान् के पास देने के लिए सबसे बड़ी वस्तु कोई है तो वह है भक्ति।
















भगवान् संसार की बड़ी से बड़ी वास्तु और भोग प्रदान कर अपना पीछा छुडा लेते है ,परंतु अपने चरणों की अविचल भक्ति नहीं देते ।नारी भक्ताओ का चरित्र हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ रहा है, लंका में सर्वश्रेष्ठ भक्ता त्रिजटा है ऐसा संतो का मत है।
इस प्रकार त्रिजटाचरित्र भक्ति, विवेक और व्यवहारकुशलता का एक मणिकाञ्चन योग है।
शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।























































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































































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Thursday, April 16, 2020

रामायण आरती

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामायण आरती वह संगीतमय प्रार्थना है जो रामचरितमानस के किसी अंश या संपूर्ण पाठ के पूरे होने पर की जाती है। इसमें रामचरितमानस की महिमा का गुणगान किया गया है।

आरती श्री रामायण जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ॥
गावत ब्रहमादिक मुनि नारद । बालमीकि बिग्यान बिसारद ॥ शुक सनकादि शेष अरु शारद । बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥1॥
आरती श्री रामायण जी की........॥
गावत बेद पुरान अष्टदस । छओं शास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥ मुनि जन धन संतान को सरबस । सार अंश सम्मत सब ही की ॥2॥
आरती श्री रामायण जी की........॥
गावत संतत शंभु भवानी । अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ॥ ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी । कागभुशुंडि गरुड़ के ही की ॥3॥
आरती श्री रामायण जी की........॥
कलिमल हरनि बिषय रस फीकी । सुभग सिंगार भगति जुबती की ॥ दलनि रोग भव मूरि अमी की । तात मातु सब बिधि तुलसी की ॥4॥
आरती श्री रामायण जी की........॥



































































































































































































































































































































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